Friday, January 11, 2013

एक पत्ते की दास्तां

       
  




एक पत्ते की दास्तां 

ये कहानी हे उस पत्ते की जो ड़ाल से अभी अभी गिरा
और गिरते ही हवा के साथ ना  कहा घुलमिल हुआ

वह बहुत घबराया हुआ था क्योंकि वह एक अनजान दुनिया में जा पंहुचा
वहा सब बेगाने है उसका अपना कोई नहीं

 जीवन की इस घड़ी में साथी सगा कोई नही
 की दुनिया में कोई उसे जानता नहीं
वहाँ  की दुनिया में कोई उसे पहचानता नहीं

धुल भरी आंधी न जाने उसे कितनी दूर ले गयी
अपनों को देखने के लिए उसकी आँखे तक तरस गयी

ज़िन्दगी  डाल से क्या अलग हुई
सारा वातावरण ही बदल ही बदल गया ,
हरियाली का आलम अचानक से पतजड़ में बदल गया!

फिर भी उस मुरझाये हुए पत्ते को आस थी,की एक दिन फिर तूफ़ान आएगा,
और उसे उसी पेड़ के पास उसकी दुनिया पहुचायेगा !

इसी उम्मीद के साथ उसने हिम्मत नहीं हारी ,
वो हरा भरा रहा ,उन बेगानो की दुनिया में वो अकेला जीता रहा!

अगले साल फिर तूफ़ान आया,सबके लिए पतजड़ लेकिन उस पत्ते के लिए हरियाली लाया !

उम्मीद और विश्वास ने अपना रंग दिखाया ,
इस बार सीधी दिशा की जगह तूफ़ान उलटी दिशा से आया!

फिर वही पत्ता अपनी पुरानी जगह पहुंच गया,
बेगानो को छोड़ अपनों के पास पहुंच गया!

बहुत बूढ़ा हो चूका था पत्ता,न समझ  पाया तूफ़ान को ,
शांत खड़ा होकर देखता रहा अपनी उसी पुरानी डाल को!

देखा तो पाया डाल अपनी रंगत बदल चूका था,
पुराने पत्ते छोड़ नए पत्तो से रिश्ता जोड़ चूका था

दिल टुटा उस पत्ते का जब डाल ने ही नहीं पहचाना ,
और कह दिया-अब नए पत्ते है मेरे पास तो पुराणो से लया रिश्ता निभाना !
                              फिर क्या था। ....

उस पत्ते ने अपनी अंतिम सासे वही उस पत्ते के पास छोड़ दी ,
यह पेड़ हमेशा खुश रहे,यही कहकर अपनी साँसे थोड़ दी। .......

Thursday, January 3, 2013

मुक्तागिरी

मुक्तागिरी एक पावन नगरी 
जहाँ बादलों की छाव में झरनों से निर्जल बहता है,
जहाँ केसर की वर्षा होती है भक्ति का अमृत बरसता है
पर्वतों में बसा यह सिद्ध क्षेत्र मुक्तागीरी कहलाता है
जहा भक्तजनों के मन से हरदम जय पारस निकलता है

सिद्ध  क्षेत्र की पावन भूमि अपना इतिहास बताती है
लाखों मुनियों की घोर तपस्या यही भूमि दर्शाति है
बैसाखी सब छोड यहाँ इंसान स्वय चल उठता है,
गुंगो के मुख से भी यहाँ जय पारस निकलता है

प्रक्रति का उत्तम सौन्दर्य यहाँ देखने मिलता है,
जब मंद हवा से झरनों का जल स्वयं कल कल करता है
52 जिनालयों की वंदना को सच्चे मन से करता है
प्रभु पारस की भूमि से वह मन वांछित फल पा जाता है

आओ हम सब प्रण करे-
इस पावन भूमि को अपने मन मंदिर बसायेगे ,
प्रभु पारस के आगन के जैसा हम पौधा लगायेगे
प्रकति के उस सौन्दर्य को अपनी धरा पर लायेगे।
छोटे छोटे पौधों के अपना उपवन सजायेगे