Saturday, May 30, 2020

मैं कौन हूँ


मैं कौन हूँ 

मैं कौन हु ,आया कहाँ से 
दुनिया से मेरा क्या नाता है ,
जो दिखता  है क्या वो सच है ,
या सिर्फ भीतर वाला अपना है ??

पूरा संसार तो पुदगल  है ,
तो तू क्यों इसमें रमता है
 राग द्वेष के चक्कर में तू 
व्यर्थ ही कर्म बढ़ाता है !!

ये मेरा है ,ये है अपना 
इस राग से तेरा न कुछ होगा 
वो हट जाये वो मिट जाए ,
इससे तू द्वेष बढ़ाता है 
इस राग द्वेष के चक्कर में 
तू व्यर्थ ही कर्म बढ़ाता है!!


बहुपुण्य सयोगों से तुझको 
अब मिला है ये नरभव जीवन 
जिनवाणी के समागम से 
सफल बना मानव जीवन !!

जिनवाणी को पाकर भी
अगर विषियों में यु फसता रहा 
मानो मणिरतन पाकर भी तू 
फकीरों सा लुढकता रहा !!

अब भी समय है तू जाग अभी 
आत्मचिंतन कर पायेगा,
अपने पुरषार्थ  की ताकत से 
कर्मो की निर्जरा ख़िरायेगा !!
चारो गतियों के सागर में 
कही भी वह सच्चा सुख नहीं ,
सिद्धालय को अपना लक्ष्य बना 
वहीं सच्चा सुख पायेगा !!

अरे कई बार तू सिद्धालय तक भी 
जाकर वापिस लौटा है,
यु हार कर मत बैठ अभी
यही आखरी मौका है !!

स्वाध्ययाय महान तप कर
अपने पुरषार्थ में लगा रह
सम्यक्त्व की अमृत धरा में
अपने को डुबोता रह !!

जिस दिन सम्यक दर्शन ज्ञान
 चरित्र को तू पाएगा
उसी क्षण तेरी पर्याय से तू
स्वयं सिद्ध बन जायेगा !

मैं उस भाविश्तव को अभी से नमन करती हु
यही अंतिम निवेदन से अपनी कलम को विराम देती हु !!






Tuesday, January 9, 2018

सिंह की दहाड़

सिंह  की दहाड़  
Jan 8 2018 .... 


नया साल नयी उमंग 
तू एक नयी उड़ान ले,
जोश की छलांग भर 
तू सिंह सा दहाड़ ले !

देख  नयी किरणों को ,
सीखा रही तुझे रोज़ नया ,
तू उस किरण की रौशनी से 
अपनी मंज़िल तराश ले!

तू चल अभी तू चल अभी 
मत सोच मंज़िल है कहाँ 
जोश से कदम बढ़ा 
पाएगा मंज़िल वहाँ !

मत सोच जो कुछ बीत गया,
ढलते सूरज संग निकल गया 
अब नए रवि की आग में 
तू सिंह सा दहाड़ ले!

कठनाईयाँ तो रास्ते पर 
निरन्तर तुझे निखारती ,
उस आग का तू पानी बनकर 
अपनी नयी पहचान दे !

जीवन के इस वन में 
कहीं सिंह  तो दहाड़ेगे 
कुछ दूर से गुर्राऐगे ,
तो कुछ करीब भी आएंगे | 

उन सब के बीच खड़ा ,
तू अपनी ताकत बटोर ले ,
अपने स्वाभिमान सहित ,
तू एक बड़ी दहाड़ दे!

एक शिखर ठहराव ले,
देख कहा क्या हो रहा 
कौन  तेरे संग रहा और 
क्या तुझे है मिला ?

न कोई तेरे संग चला ,
न कोई तुझको मिला!!

तू स्वम् भी एक सिंह  है,
किसी की तुझे जरुरत नहीं ,
तेरे स्वम् की ताकत से 
हिल सकती है शायद दुनिया भी !

फिर क्या है डर तुझे 
कोई भय तुझे सताये न ,
अपने लक्ष्य को साधकर 
एक बड़ी दहाड़ दे 
तू सिंह  सा दहाड़ ले 
तु सिंह  सा दहाड़ ले!



Tuesday, April 15, 2014

शिखर से शिखर तक

शिखर से शिखर तक 




शिखर से शिखर का सफर एक अनूठा अहसास दिलाता है ,
जब स्मरण करे वो पल तो मीठी मुस्कान वो लता है 
सम्मेद शिखर से शुरू पड़ाव ,न सोचा था इतना अदभूत  होगा,
ऊचे पर्वतो का वो सुनहरा नज़ारा क्या इतना अदुितिया होगा 


खड़ी चढाई उचा पर्वत कुछ कठिन सा लगता था,
अँधेरे में बस चलते चलो कुछ अजीब सा लगता था 
फिर क्या था …। 
पकड़ी लाठी और चल पड़े ले भोमिया जी का नाम,
उनके हवाले कर दिया अब अगले दिन का काम 
चल पड़े अपनों के साथ ,था एक दूसरे का विश्वास 
आगे पीछे होते गए पर नहीं हारने दी मन की आस 

चन्द्रमुख रौशनी के संग पार करा जब चोपराकुंड 
तो पाया प्रभु का  जलाभिषेक हुए उनके दिव्य दर्शन 
अब मन में उत्साह जगा आगे जल्दी बढ़ना है,
ऊपर का अदुितीय नज़ारा आखो में कैद करना है 

गौतम स्वामी की टोंक पर मंद हवा ने जब तान छेड़ी ,
तो मानो ऐसा लगा प्रभु के चरण कमलो ने वायु की चादर ओढ़ी 
लिया कपूर और अर्घ पड़ा करा चरणो को प्रर्ाम 
मात्र एक परिक्रमा करने से पाया अनेक मुनियो का मोक्ष स्थान

करवा आगे चलता गया,टोको को करते  प्रणाम 
दीपक कपूर अर्घ सहित जाना प्रभु का मोक्ष स्थान 
प्रकति की अपार लीला ऐसी जगह देखी जाती 
जहा अनेकानेक साधुओ की घोर  तपस्या आकि जाती 
ऊचे पर्वत बैठ शिखर पर,पाया जिन्होंने मोक्षधाम 
उन सबके चरणो की वंदना करते गए सब हाथ थाम 

एक पड़ाव पार हुआ जब चन्द्रप्रभु की टोंक छुई 
एक शिखर से दूसरे शिखर की कुछ दुरी जो तय हुई 
कुछ समय विश्राम किया फिर चल पड़े जलमंदिर की ओर  
रास्ते के टोको का वंदन करते चल पड़े आगे की ओर 

कुछ राहगीर थके दिखे तो कुछ में था उत्साह भरा
 कुछ डोली पर बैठे दिखे और कुछ ने तो था मौन धरा 
सबकी मंज़िल एक थी वो सम्मेद शिखर की उँची टोंक 
वो पारसनाथ का उचा शिखर जो थी श्रृंख्ला की आखिरी टोंक 

बस चलते गए चलते गए ले पारस का नाम 
कठिन पड़ाव भी पार करा ले हाथो को थाम 
मंज़िल बहुत करीब दिखी जब पार किया जलमंदिर भी 
मन में अधिक ख़ुशी जगी मध्य राह पार करने की 

तपता सूरज सर पर था,कही छाँव  भी दिखी नहीं 
गर्मी का आलम बढ़ता रहा पर रुकना तो काम हुआ नहीं 

अनेकानेक मुनियो ने जहा घोर तपस्या साधी थी,
उस भूमि पर चढ़े चले जो स्वयं ही पुर्नियगामी थी 
कण कण में ईश्वर बसे यहाँ,यह जगह अद्धितीय निराली है,
पग पग में टोको पर चरण कमल और सबकी महिमा प्यारी है 

अपनीमंज़िल अब करीब दिखी अब कुछ पंग्ति का रास्ता था,
थके तन ने फिर जोश भरा,प्रभु का टोंक जो समीप था 
फिर क्या था। … 
चंचलमन भी शांत हुआ निर्मल हुआ आखो  का नीर ,
प्रभु के चरण को स्पर्श कर खुल गयी सबकी तक़दीर 
मौन खड़े देखते रहे प्रभु के चरणों को बार बार,
स्पर्श करते सोचते रहे कब देखेंगे ये अगली बार 

तृप्त हुआ जीवन दर्शन पाकर,जहा है प्रभु का मोक्षस्थान 
मात्र एक स्पर्श से ही दूर हुई सम्पूर्ण चढाई की थकान 
सूरज अब ढलने लगा,संध्या ने भी डाली ओढ़ 
तब सोचा फिर चल पड़े निचे अब ढलान की ऒर 

सच यह बात कहत सब भाई,
एकबार वन्दे जो कोई तक फिर पशुगति नहीं होइ 
सम्मेद शिखर का यह पड़ाव  सदेव ही स्मरणीय रहेगा,
जब भी यह कविता पड़ेंगे,आँखो में वो झिलमिल होगा …। 


Friday, January 11, 2013

एक पत्ते की दास्तां

       
  




एक पत्ते की दास्तां 

ये कहानी हे उस पत्ते की जो ड़ाल से अभी अभी गिरा
और गिरते ही हवा के साथ ना  कहा घुलमिल हुआ

वह बहुत घबराया हुआ था क्योंकि वह एक अनजान दुनिया में जा पंहुचा
वहा सब बेगाने है उसका अपना कोई नहीं

 जीवन की इस घड़ी में साथी सगा कोई नही
 की दुनिया में कोई उसे जानता नहीं
वहाँ  की दुनिया में कोई उसे पहचानता नहीं

धुल भरी आंधी न जाने उसे कितनी दूर ले गयी
अपनों को देखने के लिए उसकी आँखे तक तरस गयी

ज़िन्दगी  डाल से क्या अलग हुई
सारा वातावरण ही बदल ही बदल गया ,
हरियाली का आलम अचानक से पतजड़ में बदल गया!

फिर भी उस मुरझाये हुए पत्ते को आस थी,की एक दिन फिर तूफ़ान आएगा,
और उसे उसी पेड़ के पास उसकी दुनिया पहुचायेगा !

इसी उम्मीद के साथ उसने हिम्मत नहीं हारी ,
वो हरा भरा रहा ,उन बेगानो की दुनिया में वो अकेला जीता रहा!

अगले साल फिर तूफ़ान आया,सबके लिए पतजड़ लेकिन उस पत्ते के लिए हरियाली लाया !

उम्मीद और विश्वास ने अपना रंग दिखाया ,
इस बार सीधी दिशा की जगह तूफ़ान उलटी दिशा से आया!

फिर वही पत्ता अपनी पुरानी जगह पहुंच गया,
बेगानो को छोड़ अपनों के पास पहुंच गया!

बहुत बूढ़ा हो चूका था पत्ता,न समझ  पाया तूफ़ान को ,
शांत खड़ा होकर देखता रहा अपनी उसी पुरानी डाल को!

देखा तो पाया डाल अपनी रंगत बदल चूका था,
पुराने पत्ते छोड़ नए पत्तो से रिश्ता जोड़ चूका था

दिल टुटा उस पत्ते का जब डाल ने ही नहीं पहचाना ,
और कह दिया-अब नए पत्ते है मेरे पास तो पुराणो से लया रिश्ता निभाना !
                              फिर क्या था। ....

उस पत्ते ने अपनी अंतिम सासे वही उस पत्ते के पास छोड़ दी ,
यह पेड़ हमेशा खुश रहे,यही कहकर अपनी साँसे थोड़ दी। .......

Thursday, January 3, 2013

मुक्तागिरी

मुक्तागिरी एक पावन नगरी 
जहाँ बादलों की छाव में झरनों से निर्जल बहता है,
जहाँ केसर की वर्षा होती है भक्ति का अमृत बरसता है
पर्वतों में बसा यह सिद्ध क्षेत्र मुक्तागीरी कहलाता है
जहा भक्तजनों के मन से हरदम जय पारस निकलता है

सिद्ध  क्षेत्र की पावन भूमि अपना इतिहास बताती है
लाखों मुनियों की घोर तपस्या यही भूमि दर्शाति है
बैसाखी सब छोड यहाँ इंसान स्वय चल उठता है,
गुंगो के मुख से भी यहाँ जय पारस निकलता है

प्रक्रति का उत्तम सौन्दर्य यहाँ देखने मिलता है,
जब मंद हवा से झरनों का जल स्वयं कल कल करता है
52 जिनालयों की वंदना को सच्चे मन से करता है
प्रभु पारस की भूमि से वह मन वांछित फल पा जाता है

आओ हम सब प्रण करे-
इस पावन भूमि को अपने मन मंदिर बसायेगे ,
प्रभु पारस के आगन के जैसा हम पौधा लगायेगे
प्रकति के उस सौन्दर्य को अपनी धरा पर लायेगे।
छोटे छोटे पौधों के अपना उपवन सजायेगे 

Monday, September 3, 2012

FOR U MY DEAR...

FOR U MY DEAR...



A strong appealing personality with the broad smile on the face,
it seem as if fragnance of flowers has spread in all over the place.
The relation of mine with them is the same, 
as with dice and the game.

As the sunshine makes the sunflower,
as the rainbow makes the whole bar.
The same way i m close to them,
It seem I m been made only for them.

He is the one with whom I can share my feeling,
He is the one with i can see the dreams of living.
U must be thinking who is that person with whom she is so attached,
that she has started writing quotes for that-


So my dear what u are thinking about????
As he is U and only U for
whom I m talking about...

THE SILENT NIGHT

THE SILENT NIGHT


The day was quite cold & blast,
then the night began to start.
I took the dinner n went to gallery,
n saw some miracle in the last.

The whole atmosphere was dark and deep,
It seems that every part of the nature began to peep.
I made up a mind and went to walk,
And then  I same to know how nature's talk.

The waves,the moon,the stars,the sky,
were playing the game as if they all are spy.
The fog was covering the whole ground,
as if he is taking an empire round.

The trees near beach were standing in the silence,
as if they are trying to stop the road violence.
I sat on the rock with the smiling face,
and saw tha whole game without any phase.

In real god is the master and we are the tame,
becoz we cannot create this beautiful nature as same.
I closed my eyes and opened again,
Then i felt some droplet of rain.

Nature forced mr to move back to home,
and it seems he want to say
-"there is no need to rome"
I came again to my destiny to my home,
leaving a nature there with a spouse.