मैं कौन हूँ
मैं कौन हु ,आया कहाँ से
दुनिया से मेरा क्या नाता है ,
जो दिखता है क्या वो सच है ,
या सिर्फ भीतर वाला अपना है ??
पूरा संसार तो पुदगल है ,
तो तू क्यों इसमें रमता है
राग द्वेष के चक्कर में तू
व्यर्थ ही कर्म बढ़ाता है !!
ये मेरा है ,ये है अपना
इस राग से तेरा न कुछ होगा
वो हट जाये वो मिट जाए ,
इससे तू द्वेष बढ़ाता है
इस राग द्वेष के चक्कर में
तू व्यर्थ ही कर्म बढ़ाता है!!
बहुपुण्य सयोगों से तुझको
अब मिला है ये नरभव जीवन
जिनवाणी के समागम से
सफल बना मानव जीवन !!
जिनवाणी को पाकर भी
अगर विषियों में यु फसता रहा
मानो मणिरतन पाकर भी तू
फकीरों सा लुढकता रहा !!
अब भी समय है तू जाग अभी
आत्मचिंतन कर पायेगा,
अपने पुरषार्थ की ताकत से
कर्मो की निर्जरा ख़िरायेगा !!
चारो गतियों के सागर में
कही भी वह सच्चा सुख नहीं ,
सिद्धालय को अपना लक्ष्य बना
वहीं सच्चा सुख पायेगा !!
अरे कई बार तू सिद्धालय तक भी
जाकर वापिस लौटा है,
यु हार कर मत बैठ अभी
यही आखरी मौका है !!
स्वाध्ययाय महान तप कर
अपने पुरषार्थ में लगा रह
सम्यक्त्व की अमृत धरा में
अपने को डुबोता रह !!
जिस दिन सम्यक दर्शन ज्ञान
चरित्र को तू पाएगा
उसी क्षण तेरी पर्याय से तू
स्वयं सिद्ध बन जायेगा !
मैं उस भाविश्तव को अभी से नमन करती हु
यही अंतिम निवेदन से अपनी कलम को विराम देती हु !!
यु हार कर मत बैठ अभी
यही आखरी मौका है !!
स्वाध्ययाय महान तप कर
अपने पुरषार्थ में लगा रह
सम्यक्त्व की अमृत धरा में
अपने को डुबोता रह !!
जिस दिन सम्यक दर्शन ज्ञान
चरित्र को तू पाएगा
उसी क्षण तेरी पर्याय से तू
स्वयं सिद्ध बन जायेगा !
मैं उस भाविश्तव को अभी से नमन करती हु
यही अंतिम निवेदन से अपनी कलम को विराम देती हु !!
No comments:
Post a Comment