शिखर से शिखर का सफर एक अनूठा अहसास दिलाता है ,
जब स्मरण करे वो पल तो मीठी मुस्कान वो लता है
सम्मेद शिखर से शुरू पड़ाव ,न सोचा था इतना अदभूत होगा,
ऊचे पर्वतो का वो सुनहरा नज़ारा क्या इतना अदुितिया होगा
खड़ी चढाई उचा पर्वत कुछ कठिन सा लगता था,
अँधेरे में बस चलते चलो कुछ अजीब सा लगता था
फिर क्या था …।
पकड़ी लाठी और चल पड़े ले भोमिया जी का नाम,
उनके हवाले कर दिया अब अगले दिन का काम
चल पड़े अपनों के साथ ,था एक दूसरे का विश्वास
आगे पीछे होते गए पर नहीं हारने दी मन की आस
चन्द्रमुख रौशनी के संग पार करा जब चोपराकुंड
तो पाया प्रभु का जलाभिषेक हुए उनके दिव्य दर्शन
अब मन में उत्साह जगा आगे जल्दी बढ़ना है,
ऊपर का अदुितीय नज़ारा आखो में कैद करना है
गौतम स्वामी की टोंक पर मंद हवा ने जब तान छेड़ी ,
तो मानो ऐसा लगा प्रभु के चरण कमलो ने वायु की चादर ओढ़ी
लिया कपूर और अर्घ पड़ा करा चरणो को प्रर्ाम
मात्र एक परिक्रमा करने से पाया अनेक मुनियो का मोक्ष स्थान
करवा आगे चलता गया,टोको को करते प्रणाम
दीपक कपूर अर्घ सहित जाना प्रभु का मोक्ष स्थान
प्रकति की अपार लीला ऐसी जगह देखी जाती
जहा अनेकानेक साधुओ की घोर तपस्या आकि जाती
ऊचे पर्वत बैठ शिखर पर,पाया जिन्होंने मोक्षधाम
उन सबके चरणो की वंदना करते गए सब हाथ थाम
एक पड़ाव पार हुआ जब चन्द्रप्रभु की टोंक छुई
एक शिखर से दूसरे शिखर की कुछ दुरी जो तय हुई
कुछ समय विश्राम किया फिर चल पड़े जलमंदिर की ओर
रास्ते के टोको का वंदन करते चल पड़े आगे की ओर
कुछ राहगीर थके दिखे तो कुछ में था उत्साह भरा
कुछ डोली पर बैठे दिखे और कुछ ने तो था मौन धरा
सबकी मंज़िल एक थी वो सम्मेद शिखर की उँची टोंक
वो पारसनाथ का उचा शिखर जो थी श्रृंख्ला की आखिरी टोंक
बस चलते गए चलते गए ले पारस का नाम
कठिन पड़ाव भी पार करा ले हाथो को थाम
मंज़िल बहुत करीब दिखी जब पार किया जलमंदिर भी
मन में अधिक ख़ुशी जगी मध्य राह पार करने की
तपता सूरज सर पर था,कही छाँव भी दिखी नहीं
गर्मी का आलम बढ़ता रहा पर रुकना तो काम हुआ नहीं
अनेकानेक मुनियो ने जहा घोर तपस्या साधी थी,
उस भूमि पर चढ़े चले जो स्वयं ही पुर्नियगामी थी
कण कण में ईश्वर बसे यहाँ,यह जगह अद्धितीय निराली है,
पग पग में टोको पर चरण कमल और सबकी महिमा प्यारी है
अपनीमंज़िल अब करीब दिखी अब कुछ पंग्ति का रास्ता था,
थके तन ने फिर जोश भरा,प्रभु का टोंक जो समीप था
फिर क्या था। …
चंचलमन भी शांत हुआ निर्मल हुआ आखो का नीर ,
प्रभु के चरण को स्पर्श कर खुल गयी सबकी तक़दीर
मौन खड़े देखते रहे प्रभु के चरणों को बार बार,
स्पर्श करते सोचते रहे कब देखेंगे ये अगली बार
तृप्त हुआ जीवन दर्शन पाकर,जहा है प्रभु का मोक्षस्थान
मात्र एक स्पर्श से ही दूर हुई सम्पूर्ण चढाई की थकान
सूरज अब ढलने लगा,संध्या ने भी डाली ओढ़
तब सोचा फिर चल पड़े निचे अब ढलान की ऒर
सच यह बात कहत सब भाई,
एकबार वन्दे जो कोई तक फिर पशुगति नहीं होइ
सम्मेद शिखर का यह पड़ाव सदेव ही स्मरणीय रहेगा,
जब भी यह कविता पड़ेंगे,आँखो में वो झिलमिल होगा …।

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