मुक्तागिरी एक पावन नगरीजहाँ बादलों की छाव में झरनों से निर्जल बहता है,
जहाँ केसर की वर्षा होती है भक्ति का अमृत बरसता है
पर्वतों में बसा यह सिद्ध क्षेत्र मुक्तागीरी कहलाता है
जहा भक्तजनों के मन से हरदम जय पारस निकलता है
सिद्ध क्षेत्र की पावन भूमि अपना इतिहास बताती है
लाखों मुनियों की घोर तपस्या यही भूमि दर्शाति है
बैसाखी सब छोड यहाँ इंसान स्वय चल उठता है,
गुंगो के मुख से भी यहाँ जय पारस निकलता है
प्रक्रति का उत्तम सौन्दर्य यहाँ देखने मिलता है,
जब मंद हवा से झरनों का जल स्वयं कल कल करता है
52 जिनालयों की वंदना को सच्चे मन से करता है
प्रभु पारस की भूमि से वह मन वांछित फल पा जाता है
आओ हम सब प्रण करे-
इस पावन भूमि को अपने मन मंदिर बसायेगे ,
प्रभु पारस के आगन के जैसा हम पौधा लगायेगे
प्रकति के उस सौन्दर्य को अपनी धरा पर लायेगे।
छोटे छोटे पौधों के अपना उपवन सजायेगे
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